बच्चों की कहानियां कार्टून

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बच्चों की कहानियां कार्टून

बच्चों की कहानियां कार्टून :-  1. हीरे की पहचान

बच्चों की कहानियां कार्टून, बहुत पहले की बात है। एक व्यक्ति अपने वृद्ध पिता के साथ रहता था। वह दिनभर परिश्रम करता था, जिससे कुछ धन अर्जित होता और वह स्वयं के लिए और अपने पिता के लिए भोजन पकाता था। उन दोनों का जीवन बहुत ही निर्धनता से गुजर रहा था। समय बीतता गया… व्यक्ति का वृद्ध पिता बीमार हो गया। जिसके कारण उस व्यक्ति की समस्या और बढ़ गई। एक दिन की बात है, व्यक्ति के बीमार पिता ने उसे अपने पास बुलाया और दो बड़े हीरे देते हुए कहा इनमें से एक असली हीरा है और एक कांच का टुकड़ा है|

परंतु आज तक कोई भी इंसान यह पहचान नहीं पाया है कि कौन सा असली हीरा है और कौन सा कांच का टुकड़ा है| यह मेरे स्वर्गीय पिता की आखरी निशानी है जिसे आज मैं तुम्हें दे रहा हूं| व्यक्ति के पिता ने यह कहकर अपने प्राण त्याग दिए| पिता के मरने से वह व्यक्ति बहुत दुखी हुआ|

कुछ दिन बाद उसके मन में विचार आया कि उसके पिता के पास कीमती हीरा होते हुए भी उसे निर्धनता में जीवन व्यतीत करना पड़ा किंतु अब वह धनवान होने के बारे में सोचने लगा। एक विचार उसके मन में यह भी था कि यदि हीरा बेचना होता तो उसके पिता उसे पहले ही हीरा दे देते…उसे समझ आ गया कि पिता को उनके पिता ने निशानी के आधार पर हीरा दिया। और अब उसे भी इसके पिता ने आखरी निशानी के आधार पर दिया है।

अचानक! उसके मन में एक योजना आई। वह व्यक्ति अपने राज्य के राजा के पास गया और उनसे कहा कि मेरे पास एक जैसे दो हीरे हैं किंतु इनमें से एक असली है, और दूसरा कांच का टुकड़ा है| यदि कोई व्यक्ति इन दोनों को परख कर असली और नकली की पहचान करके बताएगा तो यह हीरा मैं आपके राज्य के राज्यकोष में जमा करा दूंगा और यदि कोई भी व्यक्ति असली और नकली हीरे की पहचान नहीं कर सका तो आपको राज्य के राजकोष में से हीरे की कीमत के बराबर मुझे धन देना होगा|

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राजा ने उस व्यक्ति की शर्त स्वीकार कर ली और अपने राज्य के कई व्यक्तियों को उस हीरे की पहचान करने के कार्य में लगा दिया| परंतु उस राज्य का कोई भी व्यक्ति हीरे की सही परख नहीं कर पाया| अतः राजा को उस व्यक्ति के लिए हीरे की कीमत के बराबर धन अपने राज्यकोष से देना पड़ा|

ऐसा होने से व्यक्ति बहुत खुश हुआ और इस प्रकार वह व्यक्ति अन्य राज्य के राजाओं के पास भी अपनी यही शर्त के साथ धन जीतता आया और अपने हीरे को बिना बेचे ही बहुत सारा धन एकत्रित कर लिया और धनवान बन गया। एक दिन वह व्यक्ति अपना सारा धन और अपने दोनों हीरे को लेकर अपने घर वापस लौट रहा था तो उसे रास्ते में एक छोटा सा अन्य राज्य दिखाई दिया| फिर उसने उस राज्य के भी राजा से भेंट करने का प्रस्ताव रखा|

सर्दी का मौसम था इसलिए उस राज्य के राजा ने अपना दरबार खुले आकाश के नीचे धूप में लगा रखा था जिससे राज्य की सभी प्रजा और दरबारी वहीं उपस्थित रहकर धूप सेक रहे थे और राज्य दरबार के कार्य भी कर रहे थे| वह व्यक्ति भी इजाजत लेकर राज दरबार के अंदर आया और उसने राजा से कहा कि मेरे पास दो हीरे हैं जिसमें से एक असली है और दूसरा कांच का टुकड़ा है मैं अनेकों राज्य के राजा के पास जाता हूं और इन दोनों हीरे को परखने के लिए कहता हूं किंतु आज तक कोई भी व्यक्ति असली और नकली की पहचान नहीं कर पाया इसलिए मैं विजेता बनकर घूम रहा हूं|

आज मैं आपके राज्य में भी अपनी वही शर्त लेकर आया हूं व्यक्ति ने अपने दोनों हीरे राजा के सामने मेज पर रख दिए और कहा यदि आपके राज्य में कोई भी व्यक्ति इन दोनों हीरो में असली और नकली की पहचान कर पाया तो मैं हार जाऊंगा और यह हीरा मैं आपके राज्य के राज्य कोष में जमा करा दूंगा… यदि कोई भी व्यक्ति असली और नकली की पहचान करने में असमर्थ रहता है तो आपको भी इस हीरे की कीमत के बराबर अपने राज्य के राज्यकोष से धन मुझे देना होगा|

तब राजा और राज्य के सभी दरबारी ने कहा हम आपके हीरे की पहचान करने में असमर्थ हैं| यह सुनते ही प्रजा में से एक बूढ़ा और अंधा व्यक्ति आगे आता है और राजा से कहता है यदि आपकी आज्ञा हो तो मुझे भी हीरे की पहचान के लिए एक अवसर दीजिए|

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मामला राज्य के सम्मान का था इसलिए राजा ने अंधे – बूढ़े व्यक्ति को हीरे की परख करने के लिए आज्ञा दे दी| बूढ़ा व्यक्ति आगे बढ़ता है और जैसे ही दोनों हीरे को हाथ लगाता है तुरंत बता देता है कि इसमें से हीरा कौन सा है और कांच का टुकड़ा कौन सा है|

अंधे की बात सुनकर सभी हैरत में पड़ जाते हैं तब वह व्यक्ति पूछता है आपने बिल्कुल सही पहचान की है परंतु मैं हारने से पहले आपसे यह अवश्य! अवश्य जानना चाहता हूं कि आपने बिना देखे हीरे और कांच के टुकड़े की सही पहचान किस प्रकार की? तो उस अंधे आदमी ने कहा कि हम सभी लोग धूप में बैठे हैं, और यह दोनों हीरे भी धूप में ही रखे हैं…जो इस धूप में भी ठंडा रहा हीरा है, और जो गर्म हो गया वह कांच का टुकड़ा है|

अंधे के इस तर्क से राजा अति प्रसन्न हुआ। उसके राज्य का मान बढ़ गया और हीरे को राज्य के राजकोष में। जमा करा दिया।

शिक्षा जो व्यक्ति छोटी-छोटी बात पर क्रोध करने लगते हैं वह इंसान कांच के समान है और जो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी ठंडा रहे वह इंसान ही रहता है

बच्चों की कहानियां कार्टून :-  2. ईमानदारी का फल

बच्चों की कहानियां कार्टून, बहुत समय पहले की बात है। एक गांव में बाबूलाल नाम का एक पेंटर रहता था। वह बहुत ईमानदार था। वह घर घर जाकर पेंट का कार्य करता था। उसकी आमदनी बहुत कम थी। बड़ी मुश्किल से उसके घर का खर्च चलता था। पूरे दिन का कार्य करने के बाद भी वह सिर्फ दो वक्त की रोटी का ही इंतजाम कर पाता था।

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इसलिए वह चाहता था कि उसे कोई बड़ा कार्य मिले जिससे उसकी आमदनी अच्छी हो। परंतु वह छोटे-छोटे कार्य भी बहुत ईमानदारी और कुशलता के साथ करता था। एक दिन उसे गांव के जमीदार ने बुलाया और कहा…

जमींदार : सुनो बाबूलाल, मैंने तुम्हें यहां एक बहुत जरूरी काम के लिए बुलाया है। क्या तुम वह काम कर दोगे?

बाबूलाल : जी हुजूर, जरूर कर दूंगा क्या काम है?

जमींदार : मैं चाहता हूं कि तुम मेरी नाव पेंट करो और यह काम आज ही हो जाना चाहिए अभी रामू ( जमीदार का नौकर ) नहीं है वह अपने घर छुट्टी पर गया है।

बाबूलाल : ठीक है हुज़ूर मैं यह काम आज ही कर दूंगा।
बड़ा काम पाकर बाबूलाल बहुत खुश हुआ।

जमींदार : ठीक है तो बताओ, तुम इस काम के कितने पैसे लोगे?

बाबूलाल : वैसे तो इस काम के 15 सौ रुपए हुए। फिर भी आप जो सही समझे दे दीजिएगा।

जमींदार : ठीक है तुम्हें 15 सौ रुपए मिल जाएंगे। लेकिन काम बिल्कुल बढ़िया होना चाहिए।

बाबूलाल : आप चिंता ना करें हुजूर! काम बिल्कुल बढ़िया होगा।

तभी जमीदार बाबूलाल को नाव दिखाने नदी के किनारे ले जाता है। नाव देखने के बाद बाबूलाल जमींदार से कहता है… मुझे आप मुझे कुछ समय दीजिए, मैं घर से पेंट करने का सामान लेकर आता हूं।

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बच्चों की कहानियां कार्टूनइसके बाद जमींदार और बाबूलाल दोनों अपने अपने घर चले जाते हैं। सामान लेकर जैसे ही बाबूलाल नाव के पास आता है। और उसे रंगने बैठता है उसे नाव में एक छेद दिखाई देता है। वह सोचता है अगर वह नाव को ऐसे ही रंग देता है। तो नाव डूब जाएगी। इसलिए! वह पहले छेद को बंद करने के काम में लग जाता है।

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उसके बाद वह नाव पर पेंट करने लगता है। काम पूरा होने के बाद वह जमीदार के पास जाता है। और कहता है! हुजूर नाव का काम पूरा हो गया आप चल कर देख लीजिए। जमीदार और बाबूलाल दोनों नाव की ओर चल देते हैं। वहां पहुंचकर जमीदार बाबूलाल से कहता है। वाह बाबूलाल! तुमने तो बहुत अच्छा काम किया है। अब तुम एक काम करो कल आकर अपना मेहनताना ले जाना।

बाबूलाल : जी हुजूर!
( इतना कहकर बाबूलाल अपने घर चला जाता है। )

अगले दिन… जमीदार के परिवार वाले उस नाव में बैठकर घूमने जाते हैं। कुछ देर बाद जमीदार का नौकर रामू जो उसकी नाव चलाता था छुट्टी से वापस आ जाता है। आज नाव रामू की जगह कोई अन्य व्यक्ति चला रहा था।
रामू जमीदार से परिवार वालों के बारे में पूछता। है? जमींदार रामू को परिवार वालों के घूमने की बात बताता है। जमीदार की बात सुनकर रामू चिंता में पड़ जाता है।

रामू को चिंतित देखकर जमीदार उससे पूछता है। क्या हुआ रामू? तुम मेरी बात सुनकर इतने चिंतित क्यों हो गए?

रामू : मैं आपको बताना भूल गया कि उस नाव में तो छेद था।

रामू की बात सुनकर जमीदार के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह बहुत दुखी हुआ।

कुछ ही देर में उसके परिवार वाले मौज मस्ती करते हुए घर वापस आ जाते हैं। उन्हें सकुशल देखकर जमीदार चैन की सांस लेता है। तभी वहां बाबूलाल भी आ जाता है।

जमीदार अति प्रसन्नता के साथ बाबूलाल को उसका मेहनताना देकर कहता है, तुमने बहुत बढ़िया काम किया है मैं बहुत खुश हूं। बाबूलाल पैसे लेकर गिनता है। तो हैरानी से कहता है हुजूर! आपने गलती से मुझे ज्यादा पैसे दे दिए हैं। तब

जमीदार बाबूलाल से कहता है। यह रुपए गलती से नहीं बल्कि तुम्हारे मेहनत के दिए हैं।

बाबूलाल : लेकिन हमारे बीच तो 15 सौ रुपए की बात हुई थी। यह तो 6000 रुपए हैं। फिर यह मेरी मेहनत के कैसे हुए?

जमीदार : तुमने बहुत बड़ा काम किया है बाबूलाल! मेरी नाव के छेद को ठीक कर दिया जिसके बारे में मुझे मालूम भी नहीं था। अगर तुम चाहते! तो उसे ठीक करने के अलग से पैसे मांग सकते थे। या उसे ठीक नहीं करते तो आज मेरा परिवार डूब भी सकता था। आज मेरा परिवार तुम्हारी वजह से सुरक्षित है इसलिए यह पैसे तुम्हारी मेहनत और ईमानदारी के हैं।

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बाबूलाल : लेकिन इस काम को ठीक करने के इतने पैसे तो नहीं बनते?

जमींदार : अब और तुम कुछ मत कहो बाबूलाल यह पैसे तुम्हारे ही हैं इन्हें रख लो।

जमीदार की बात सुनकर बाबूलाल ने पैसे रख लिए और बहुत खुशी के साथ उसका धन्यवाद किया।

जमीदार : धन्यवाद के असली पात्र तो तुम हो बाबू लाल।

बाबूलाल खुशी-खुशी अपने घर को लौट गया। और गांव में उसकी आमदनी भी अब पहले से ज्यादा मिलने लगी।

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